इतिहास और आस्था का संगम: ठाकुरद्वारा में सजेगा जन्माष्टमी महोत्सव

राज्य

जालौर

जालोर शहर की बड़ी पोल स्थित राधा-कृष्ण मंदिर, जिसे ठाकुरद्वारा भी कहा जाता है। यह केवल आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि सामाजिक एकता और न्याय का भी प्रतीक रहा है। करीब 750 वर्ष पुराने इस मंदिर में ऐसे फैसले लिए जाते थे, जिन्हें माली समाज के 48 गांवों के लोग अंतिम मानकर स्वीकार करते थे। यहां राधा-कृष्ण की प्रतिमा को साक्षी मानकर पंचों की कमेटी निर्णय सुनाती थी और दोनों पक्ष उसका पालन करते थे।

माली समाज ठाकुरद्वारा सेवा संस्थान पांच पट्टी के अध्यक्ष भोमाराम के अनुसार, यह मंदिर 15वीं शताब्दी में बना था। यहां स्थापित राधा-कृष्ण की प्रतिमा भी उतनी ही प्राचीन है और आज भी उसी आभा के साथ विराजमान है। मंदिर की दीवारें जालोर दुर्ग की तरह लगभग साढ़े तीन फीट मोटी हैं, जो इसकी ऐतिहासिकता और मजबूती को दर्शाती हैं। एक समय समाज के 48 गांवों से जुड़े विवाद इसी मंदिर में सुलझाए जाते थे। पंचों की कमेटी प्रतिमा को साक्षी मानकर न्याय करती थी और सभी ग्रामीण उस फैसले को मानते थे। भले ही अब हर गांव में अपने-अपने मंदिर बन चुके हैं, लेकिन आज भी बड़े सामाजिक निर्णय या समाज सुधार से जुड़े फैसले यहीं लिए जाते हैं।

2018 का ऐतिहासिक निर्णय
जनवरी 2018 में इस मंदिर में पंचों, युवाओं और महासमिति ने मिलकर बड़ा फैसला लिया था। समाज में मृत्यु भोज पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्णय हुआ और आज भी यह परंपरा कायम है। इसके साथ ही अन्य सामाजिक सुधारों के कदम भी उठाए गए, जिनका पालन समाज के लोग कर रहे हैं।

धूमधाम से मनाई जाएगी जन्माष्टमी
हर साल की तरह इस बार भी जन्माष्टमी पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया गया है। आज जन्मअष्टमी पर यहां भजन संध्या, विशेष पूजा और भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा।

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