नई दिल्ली
राज्यपालों और राष्ट्रपति की ओर से किसी विधानसभा से पारित बिल पर लंबे समय तक निर्णय न लेने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में एक आदेश दिया था। बेंच ने विधेयकों पर फैसले के लिए 90 दिन की लिमिट तय कर दी थी, जिस पर राष्ट्रपति ने अदालत में रेफरेंस दाखिल किया है। उन्होंने पूछा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए टाइमलाइन तय की जा सकती है। इसी पर 5 दिन सुनवाई चल चुकी है और आज फिर से दिलचस्प बहस देखने को मिली। केंद्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने कहा कि इस तरह यदि बिलों को रोकने की बात अदालत में आई है तो क्या किसी विधेयक को मंजूरी पर भी ऐसा हो सकता है।
यही नहीं उन्होंने राज्यपाल और राष्ट्रपति के विवेकाधिकार एवं परिस्थितिजन्य निर्णय लेने की क्षमता पर अदालत में विचार होने पर भी सवाल उठाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मान लीजिए कि किसी राज्य में कानून व्यवस्था की समस्या हो गई है। स्थानीय पुलिस स्थिति को संभाल नहीं पा रही है। ऐसे में क्या अर्धसैनिक बलों की तैनाती से पहले केंद्र सरकार को अदालत में अर्जी दाखिल करनी चाहिए। मेरा तो जवाब है कि ऐसा नहीं हो सकता। यही नहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आर्टिकल 32 के तहत तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की ओर से अर्जी दाखिल करने पर भी आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा कि आर्टिकल 32 में मूलभूत अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है। एक बार कर्नाटक सरकार ने भी इसके तहत अर्जी डाली थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। बेंच का कहना था कि मूल अधिकारों के रक्षा के नाम पर सरकार अर्जी नहीं डाल सकती। कोई एनजीओ, पीड़ित पक्ष या अन्य उत्पीड़न के शिकार लोग या संस्था ऐसा कर सकते हैं, लेकिन सरकार नहीं। इस दौरान तमिलनाडु सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने भी दिलचस्प दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल और सरकार एक म्यान में दो तलवार की तरह नहीं रह सकते। दोनों को सहयोगी की भूमिका में ही रहना होगा।
राज्यपाल केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं हैं, किसने रखी दलील
उन्होंने कहा कि राज्यपाल का काम एक मार्गदर्शक का है। वह टकराव की भूमिका में नहीं आ सकते और ना ही राज्य विधानसभा की ओर से पारित विधेयकों को पलट सकते हैं। यही नहीं उन्हें केंद्र सरकार का प्रतिनिधि बताने पर भी बहस हुई। तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल कोई केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। वह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति हैं। इस पर चीफ जस्टिस गवई ने कहा कि राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर वह राज्यों में होते हैं। संविधान के मुताबिक केंद्र सरकार की शक्तियां राष्ट्रपति में समाहित होती हैं। इसलिए ऐसा कहना गलत है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं।
What do you feel about this post?
Like
Love
Happy
Haha
Sad
