नई सरकार की पुरानी टीम: क्या बदलेगी बिहार की शिक्षा–स्वास्थ्य की तस्वीर?

राज्य

छपरा

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी जनता तब हैरान रह गई, जब मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री जैसे अहम पद फिर से पुराने चेहरों को ही सौंप दिए गए। इसके बाद राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार को लेकर कई सवाल तेज हो गए हैं। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंत्रिमंडल में स्थिरता प्रशासनिक निरंतरता के लिहाज से फायदेमंद हो सकती है, लेकिन जिन विभागों की पिछले कार्यकाल में सबसे ज्यादा आलोचना हुई, जैसे सरकारी अस्पतालों की बदहाली, चिकित्सकों-कर्मियों की कमी, स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति और कमजोर आधारभूत संरचना उनमें बदलाव न होना जनता के मन में संदेह पैदा कर रहा है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार को लेकर बढ़ा असंतोष
स्थानीय लोगों का कहना है कि सदर अस्पतालों से मरीजों को बिना इलाज रेफर कर देने की पुरानी व्यवस्था अब खत्म होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग की आधारभूत संरचना तो तैयार कर दी गई है, लेकिन डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मियों की भारी कमी आज भी बनी हुई है। विगत वर्षों में स्वास्थ्य विभाग पर कई गंभीर आरोप लगे हैं, अस्पतालों में दवाओं और मशीनों की कमी, पंचायत स्तर तक स्वास्थ्य सेवाओं का कमजोर होना और बेहतर इलाज के लिए बिहार से बाहर जाने वाले मरीजों की बढ़ती संख्या प्रमुख मुद्दे हैं। ऐसे में पुरानी टीम का ही पुनः जिम्मेदारी संभालना जनता के बीच यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या अबकी बार वाकई बदलाव देखने को मिलेगा।

सारण प्रमंडल के सारण, सिवान और गोपालगंज जिलों सहित कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं “इलाज” से ज्यादा “रेफर” आधारित व्यवस्था पर निर्भर हैं। सड़क हादसे, गोलीबारी और अन्य आपात मामलों में प्रखंड अस्पतालों से लेकर जिला सदर अस्पताल तक केवल औपचारिकता निभाकर मरीजों को पटना पीएमसीएच या अन्य मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है।

शिक्षा विभाग में भी सुधारों पर सवाल
शिक्षा विभाग पर भी सरकार लगातार निशाने पर रही है। शिक्षकों की भारी कमी, स्कूलों में संसाधनों की दयनीय स्थिति और सरकारी स्कूलों के गिरते परिणामों ने चिंता बढ़ाई है। विभाग से जुड़े अधिकारियों व शिक्षक संघों का कहना है कि बिना संरचनात्मक सुधार के केवल घोषणाओं से शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने दावा किया है कि 2025–30 के कार्यकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, और बजट व इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों स्तरों पर बड़े कदम उठाए जाएंगे।

क्या बदलेगी बिहार की तस्वीर?
अब जनता की नजर इस बात पर है कि क्या पुरानी टीम, नई नीतियों और नई ऊर्जा के साथ सचमुच स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों की जर्जर स्थिति को बदल पाएगी। विशेषकर शिक्षा विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मौजूदा शिक्षा मंत्री को सौंपी गई है। जनता अब सरकारी दावों नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव का इंतजार कर रही है।

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