भोपाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भोपाल में आयोजित संघ के शताब्दी वर्ष के तहत ‘प्रबुद्ध जन सम्मेलन’ को संबोधित किया. इस दौरान भागवत ने संघ की विचारधारा,और भविष्य के लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से सामने रखा.
रवींद्र भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने हिंदुत्व, भाषा, संगठन विस्तार और संघ-भाजपा संबंधों को लेकर कई बड़ी बातें कहीं. उन्होंने कहा कि संघ को केवल भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए
भागवत ने कहा कि संघ किसी राजनीतिक दल का रिमोट कंट्रोल नहीं है, बल्कि समाज निर्माण का संगठन है. संघ की स्थापना हिंदुओं को शांतिपूर्ण तरीके से संगठित करने के लिए हुई थी. उन्होंने कहा कि हिंदू कोई जाति नहीं, बल्कि एक मनोवृत्ति है, जो सभी पंथों और संप्रदायों का सम्मान करती है.
अभी भी कई इलाकों तक नहीं पहुंच पाया संघ- भागवत
संघ के संगठनात्मक विस्तार पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में संघ से करीब 60 लाख स्वयंसेवक जुड़े हैं, जबकि देश में अपने आप को हिंदू मानने वालों की संख्या लगभग 100 करोड़ है. उन्होंने चिंता जताई कि शहरी क्षेत्रों की करीब 10 हजार बस्तियों और कई अन्य इलाकों तक संघ अभी पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है. भागवत ने कहा, 'ऐसी बस्तियों तक पहुंचना बहुत जरूरी हैं. संघ की शाखाओं में जो संस्कार मिलते हैं, वही समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं। पहले यह व्यवस्था मजबूत थी, अब उसे फिर से सशक्त करने की जरूरी है.'
उन्होंने कहा कि साधु-संतों से लेकर देश-विदेश के कई संगठन संघ के साथ जुड़े हुए हैं. अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों से लोग संघ की कार्यपद्धति को समझने आते हैं और पूछते हैं कि संघ अपने युवाओं को इस तरह कैसे तैयार करता है. और उन्हे भी इसकी ट्रेनिंग देने के लिए कहते है.
भाषा के मुद्दे पर मोहन भागवत ने तीन भाषाएं सीखने पर जोर दिया- राज्य की भाषा, देश की भाषा और दुनिया की भाषा. उन्होंने कहा कि चीन से यह सीखना चाहिए कि एक बड़ा राष्ट्र कैसे संगठित किया जाता है.
समाज को जोड़ना है संघ का काम
मोहन भागवत ने हिंदुत्व को 'जाति' नहीं बल्कि एक 'मनोवृत्ति' बताया. उन्होंने कहा कि हिंदू, हिंदवी और भारत, तीनों एक ही हैं और जो सनातन काल से चला आ रहा है और आज भी उतना ही प्रासंगिक है.
संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों को लेकर फैली भ्रांतियों पर उन्होंने कहा, 'अगर कोई भाजपा, विहिप या विद्या भारती को देखकर संघ को समझने की कोशिश करेगा, तो वह संघ के मूल विचार को कभी नहीं समझ पाएगा.' उन्होंने साफ कहा कि संघ का काम समाज को जोड़ना, संस्कार देना और उत्तम जीवन मूल्यों का निर्माण करना है, न कि किसी एक संगठन या दल तक सीमित रहना.
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