लकड़ी के तंदूर पर परोस रहा भोजन, पंजाब विश्वविद्यालय के ढाबे पर एलपीजी की कमी बेअसर

राज्य

चंडीगढ़.

पंजाब विश्वविद्यालय परिसर में 28 वर्ष पुराना एक छोटा ढाबा एलपीजी सिलेंडर की कमी और बढ़ती कीमतों के बावजूद लकड़ी के तंदूर पर भोजन बनाकर छात्रों को परोस रहा है. विश्वविद्यालय के गेट-2 के पास शांत स्थान पर स्थित यह ढाबा वर्ष 1998 में शुरू किया गया था। इसे वर्तमान संचालक गुरप्रीत सिंह के ननिहाल पक्ष के बुजुर्गों ने शुरू किया था।

समय के साथ यह ढाबा छात्रों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया। यहां मिलने वाला सादा भोजन भी छात्रों को घर की याद दिला देता है। ढाबे की सबसे खास बात इसकी पारंपरिक रसोई है। जब कई जगहों पर रसोई गैस की कमी या कीमतों में बढ़ोतरी से परेशानी बढ़ रही है, तब यहां लकड़ी के तंदूर की आंच पर रोटी और सब्जी तैयार की जा रही है। इसी कारण एलपीजी की कमी का असर इस छोटे से ढाबे पर ज्यादा नहीं पड़ रहा।

पोस्ट ग्रेजुएट होकर संभाला ढाबा
ढाबे की छत नीले रंग की तिरपाल से ढकी हुई है और बैठने की व्यवस्था भी सीमित है। एक समय में करीब बीस लोग ही यहां बैठकर भोजन कर सकते हैं। इसके बावजूद रोजाना बड़ी संख्या में छात्र यहां पहुंचते हैं और सादगी भरे भोजन का आनंद लेते हैं। अभी इसका संचालन गुरप्रीत सिंह करते हैं, जो खुद पोस्ट ग्रेजुएट हैँ।  वे बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही इस ढाबे के साथ काम किया है। उनके लिए यह केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि भावनात्मक लगाव से जुड़ा स्थान है। उनका कहना है कि वह छात्रों को सस्ता और अच्छा भोजन देने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि उनके दादा मोहनिंदर सिंह सत्तर के दशक में शहर के एक इलाके में ढाबा चलाते थे। उनकी मेहनत और स्वादिष्ट भोजन से प्रभावित होकर विश्वविद्यालय प्रबंधन ने उन्हें परिसर में ढाबा शुरू करने का अवसर दिया था। तभी से यह ढाबा लगातार चल रहा है।

सुबह 9 से दोपहर 3 बजे तक होती है वर्किंग
ढाबे की टीम में कुल तीन लोग हैं। सुबह आठ बजे से तैयारी शुरू हो जाती है। गुरप्रीत सिंह खुद बाजार से सब्जियां और जरूरी सामान लेकर आते हैं। इसके बाद सुबह नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक छात्रों को भोजन परोसा जाता है। कोविड-19 के दौरान जब विश्वविद्यालय लगभग दो वर्षों तक बंद रहा, तब ढाबे को कठिन दौर से गुजरना पड़ा। उस समय गुरप्रीत सिंह को परिवार का खर्च चलाने के लिए अतिरिक्त काम भी करना पड़ा। हालांकि परिस्थितियां सामान्य होने के बाद ढाबा फिर से पहले की तरह चलने लगा। यह ढाबा केवल भोजन का स्थान नहीं, बल्कि यादों का हिस्सा भी बन चुका है।

कई पूर्व छात्र वर्षों बाद भी यहां आकर पुराने दिनों को याद करते हैं। कुछ छात्र विदेश में बसने के बाद भी जब शहर आते हैं, तो यहां का भोजन जरूर करते हैं। छात्रों का कहना है कि यहां मिलने वाला भोजन उन्हें घर की याद दिलाता है। सादगी, अपनापन और साफ-सफाई के कारण यह छोटा सा ढाबा आज भी विश्वविद्यालय परिसर की खास पहचान बना हुआ है।

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