यूनिवर्सिटी vs सरकार: अधिकारों में दखल के विरोध में अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

राज्य

चंडीगढ़.

फरीदाबाद स्थित अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट और अल-फलाह यूनिवर्सिटी की याचिका पर जवाब देने केंद्र और हरियाणा सरकार ने कोर्ट से कुछ समय मांगा है। सरकार के अनुरोध पर हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट ने हरियाणा प्राइवेट यूनिवर्सिटीज (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार ने संशोधन के माध्यम से असीमित और मनमाने अधिकार अपने हाथ में ले लिए हैं, जो निजी और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकते हैं। याचिका में जोड़ी गई नई धाराएं 44 बी और 46 शामिल हैं, जो छह जनवरी 2025 से लागू होंगी। इन धाराओं के तहत राज्य सरकार को गंभीर चूक या राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित चिंताओं के आधार पर किसी भी निजी विश्वविद्यालय के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन धाराओं में प्रयुक्त शब्दावली अस्पष्ट है, जिससे सरकार को अत्यधिक विवेकाधीन शक्ति मिलती है। उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली के लाल किले पर हुए बम ब्लास्ट मामले में यूनिवर्सिटी का कनेक्शन मिलने के बाद सरकार ने अल-फलाह ट्रस्ट में सीनियर आइएएस अधिकारी डॉ. अमित अग्रवाल को प्रशासक नियुक्त किया है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि संशोधन के तहत सरकार सामान्य स्थिति बहाल होने के बाद भी विश्वविद्यालय पर नियंत्रण बनाए रख सकती है, जिससे निजी विश्वविद्यालय सरकारी संस्थानों में बदल सकते हैं। इसे संविधान के अनुच्छेद 30 का उल्लंघन बताया गया है।
अल-फलाह यूनिवर्सिटी, जिसे वर्ष 2015 में यूजीसी से मान्यता मिली थी, ने अदालत को बताया कि वह मेवात क्षेत्र की वंचित आबादी को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही है। याचिका में आशंका जताई गई है कि यदि सरकार प्रशासक नियुक्त करती है, तो संस्थान का अल्पसंख्यक स्वरूप समाप्त हो जाएगा और क्षेत्र में चल रही सेवाएं प्रभावित होंगी। हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार को जवाब दायर करने का आदेश दिया है।

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