द्वितीय विश्व युद्ध की हवाई पट्टियों पर फिर नजर, तीन राज्यों को मिल सकता फायदा

राज्य

रांची

राजधानी रांची से पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया और धालभूमगढ़ पहुंची एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) की टीम ने शनिवार को बंद पड़ी हवाई पट्टियों का विस्तृत निरीक्षण किया. अंचल अधिकारी नवीन पुरती की मौजूदगी में टीम ने करीब 515 एकड़ में फैली चाकुलिया हवाई पट्टी के हर हिस्से का सर्वे किया. अधिकारियों ने हवाई पट्टी की वर्तमान भौतिक स्थिति, क्षति के स्तर और रनवे की मजबूती का आकलन किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि यहां विमानों की लैंडिंग कितनी सुरक्षित और संभव है.

धालभूमगढ़ एयरपोर्ट का भी हुआ संयुक्त सर्वे
चाकुलिया के बाद एएआई की टीम धालभूमगढ़ एयरपोर्ट पहुंची. यहां भी राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर हवाई पट्टी की सीमाओं और अतिक्रमण की स्थिति को परखा गया. अधिकारियों ने बताया कि दोनों स्थानों के सर्वे के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है, जिसे 24 अप्रैल 2026 तक केंद्र सरकार को भेज दिया जाएगा. इसी रिपोर्ट के आधार पर तय होगा कि इन हवाई पट्टियों को किस स्तर पर विकसित किया जा सकता है.

द्वितीय विश्व युद्ध का गौरवशाली इतिहास
गौरतलब है कि चाकुलिया और धालभूमगढ़ की इन हवाई पट्टियों का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने लड़ाकू विमान के सुरक्षित ठहराव और रणनीतिक अभियानों के लिए कराया था. हालांकि, आजादी के बाद से ही इन हवाई पट्टियों की अनदेखी की गई. पूर्व में चाकुलिया को ‘कार्गो एयरपोर्ट’ और धालभूमगढ़ को ‘इंटरनेशनल एयरपोर्ट’ के रूप में विकसित करने के प्रस्ताव आए थे, जो किन्हीं कारणों से धरातल पर नहीं उतर सके.

तीन राज्यों की कनेक्टिविटी का केंद्र
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चाकुलिया एयरपोर्ट विकसित होता है, तो इसका सीधा लाभ न केवल झारखंड, बल्कि पड़ोसी राज्यों पश्चिम बंगाल और ओडिशा के सीमावर्ती जिलों को भी मिलेगा. केंद्र सरकार का वर्तमान फोकस हवाई पट्टियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य में दुर्घटनाओं को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम करने पर है.

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