जबलपुर
देश में ईंधन संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और न्यायिक कार्यों को निर्बाध बनाए रखने के उद्देश्य से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के कार्यालय ज्ञापन के अनुरूप जारी इस एडवाइजरी को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर लागू किया गया है।
यह निर्देश मप्र हाईकोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर, इंदौर एवं ग्वालियर खंडपीठों के साथ-साथ प्रदेश की सभी जिला अदालतों, न्यायिक अधिकारियों, कर्मचारियों और अधिवक्ताओं पर लागू होंगे। नई गाइडलाइन के तहत न्यायालयों में उपलब्ध सरकारी वाहनों के उपयोग को नियंत्रित और व्यवस्थित किया जाएगा।
निर्देशों के तहत पूल वाहनों का उपयोग केवल न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाएगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के निवास स्थान के आधार पर रूट-वाइज तथा लोकैलिटी-वाइज वाहन योजना तैयार की जाएगी। वाहनों की अधिकतम बैठने की क्षमता का उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा। किसी अधिकारी या कर्मचारी को व्यक्तिगत वाहन सुविधा केवल आपातकाल, सुरक्षा, प्रोटोकॉल अथवा चिकित्सीय आवश्यकता की स्थिति में ही उपलब्ध होगी।
अधिवक्ताओं और कर्मचारियों को कार-पूलिंग की सलाह दी गई है। हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं और कर्मचारियों से सार्वजनिक परिवहन, कार-पूलिंग तथा टू-व्हीलर पूलिंग को प्राथमिकता देने का अनुरोध किया है। इसके अलावा, अधिक व्यस्त मार्गों पर आवश्यकता के अनुसार मिनी बस, ट्रैवलर या अन्य साझा परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी व्यवस्था की जा सकती है।
ये अपील की गई
गाइडलाइन में अधिवक्ताओं से विशेष रूप से अपील की गई है कि जहां संभव हो, वे अपने मामलों की सुनवाई और पैरवी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से करें। प्रशासनिक बैठकों और आधिकारिक चर्चाओं का आयोजन भी वर्चुअल माध्यम से किया जाएगा। वकीलों और न्यायालय प्रशासन के बीच संवाद को भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए प्रोत्साहित किया जाएगा। अनावश्यक यात्रा से बचकर ईंधन की बचत सुनिश्चित की जाएगी।
हाईकोर्ट ने संबंधित विभागों को निर्देश दिए हैं कि वे वाहनों के उपयोग और ईंधन खपत की दैनिक निगरानी करें। वाहनों की उपलब्धता और उपयोग को कार्य की आवश्यकता तथा प्राथमिकता के आधार पर निर्धारित किया जाएगा। समय-समय पर इसकी समीक्षा भी की जाएगी।
यह व्यवस्था फिलहाल अस्थायी रूप से लागू
हाईकोर्ट रजिस्ट्री ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था फिलहाल अस्थायी रूप से लागू की गई है, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर ईंधन संरक्षण के प्रयासों में न्यायपालिका भी योगदान दे सके और न्यायिक कार्य प्रभावित न हों। निर्देशों में कहा गया है कि सभी संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के लिए इन उपायों का पालन अनिवार्य होगा।
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