संविदा कर्मचारियों पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, परियोजना बंद होने के बाद सेवा बहाली से किया इनकार

राज्य

चंडीगढ़
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब स्टेट काउंसिल फार साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कार्यरत संविदा वैज्ञानिक दिव्या कौशिक को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी  अपील   खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस परियोजना के लिए उनकी नियुक्ति की गई थी, वह 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है और ऐसी स्थिति में संविदा सेवा को जारी रखने का कोई आधार नहीं बनता।

जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने यह फैसला उस अपील पर सुनाया, जिसमें एकल पीठ द्वारा पारित 23 मार्च और 6 अप्रैल 2026 के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि मूल  याचिका अभी भी एकल पीठ के समक्ष लंबित है और अपील केवल अंतरिम आदेशों के खिलाफ दायर की गई है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है।

2011 में जॉइन की थी सेवा
याचिकाकर्ता दिव्या कौशिक की ओर से कहा गया कि उन्हें वर्ष 2011 में पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर (पीआईसी) में वैज्ञानिक के पद पर संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था और समय-समय पर उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। उन्होंने  याचिका में उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके पद को समाप्त कर दिया गया था। एकल पीठ ने 16 जुलाई 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

हालांकि बाद में परिषद की ओर से दायर आवेदन पर एकल पीठ ने 23 मार्च 2026 को आदेश में संशोधन करते हुए कहा था कि यदि परियोजना 31 मार्च 2026 के बाद भी बढ़ाई जाती है तो यथास्थिति का आदेश जारी रहेगा, अन्यथा परिषद उस आदेश से बाध्य नहीं होगी। इस आदेश को वापस लेने की मांग भी 6 अप्रैल 2026 को खारिज कर दी गई थी।

5 वर्षों के लिए थी परियोजना
सुनवाई के दौरान परिषद की ओर
से अदालत को बताया गया कि 'पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर' परियोजना पांच वर्ष की अवधि के लिए थी और यह 31 मार्च 2026 को पूरी हो चुकी है। इसलिए परियोजना के साथ सह-समाप्त (को-टर्मिनस) संविदा नियुक्ति भी स्वत  समाप्त हो गई। परिषद ने यह भी बताया कि नियुक्ति पत्र में स्पष्ट शर्त थी कि परियोजना की अवधि समाप्त होने पर अनुबंध समाप्त माना जाएगा।

खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ द्वारा पारित आदेश न तो अवैध हैं और न ही उनमें किसी प्रकार की त्रुटि है। चूंकि परियोजना का विस्तार नहीं हुआ और वह पूर्ण हो चुकी है, इसलिए संविदा कर्मचारी की सेवा जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने अपील खारिज कर दी

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