जजों के कामकाज पर SOP की मांग, पूर्व जज संजीव शर्मा ने कॉलेजियम व्यवस्था पर भी उठाए सवाल

राज्य

जयपुर
राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने सेवानिवृत्ति से पहले उन पर लगाए गए आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि वे न्यायिक गरिमा के कारण कई सवालों पर टिप्पणी नहीं कर सकते, लेकिन गंभीर आरोपों से जुड़ी एक याचिका न्यायाधीश मेहता के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश कैसे बनाया गया? इस पर न्यायाधीश मेहता ने कहा कि इसका जवाब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ही दे सकते हैं।

अपने आवास पर मीडिया से बातचीत में शर्मा ने कहा कि उन्हें योजनाबद्ध तरीके से मुख्य न्यायाधीश बनने से रोका गया। इससे पेशेवर रूप से कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन व्यक्तिगत रूप से दुख हुआ। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में न्यायिक गरिमा का उल्लंघन हुआ और न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा।

शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताते हुए सीजेआई को जवाब सौंपा है और मानहानि का मुकदमा करने की अनुमति भी मांगी है। उन्होंने जवाब और दस्तावेज सार्वजनिक करने से इनकार करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई को आरोपों तथा गोपनीयता भंग होने के पूरे मामले की तह में जाकर जांच करनी चाहिए।

आरोपों पर यह बोले शर्मा
न्यायिक अधिकारी पर कार्रवाई प्रकरण: डीजे अजय शुक्ला ने स्वयं स्वीकार किया कि वे अस्पताल जाने के कारण देरी से कोर्ट आए। उन्हें शुरू में एपीओ किया गया था, लेकिन जवाब आने पर दूसरी जगह लगा दिया गया। आईपीएस आनंद शर्मा के मामले से इस कार्रवाई का कोई संबंध नहीं है। वैसे भी आनंद शर्मा दूर के रिश्तेदार हैं। यदि किसी कार्रवाई में दखल करना होता तो मेरी मां और भाई के केस लंबित हैं, उन पर दखल करता, लेकिन उन पर ही दखल नहीं किया।

शर्मा ने मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम पर भी उठाए सवाल
शर्मा ने मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसमें संबंधित हाईकोर्ट के पूर्व सीजे रह चुके जजों को शामिल किया जाना चाहिए। शर्मा ने हाईकोर्ट भवन निर्माण, रामगढ़ बांध और अन्य मामलों में लगाए गए आरोपों से कोई सरोकार होने से इनकार किया।

जजों के कामकाज के लिए एसओपी की जरूरत
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के कामकाज व आचरण को लेकर स्पष्ट एसओपी या गाइडलाइन होनी चाहिए, ताकि किसी हाईकोर्ट के कामकाज में हस्तक्षेप की स्थिति भविष्य में मिसाल न बने। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा और लोगों का विश्वास बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। जाति आधारित रवैये के आरोपों पर भी उन्होंने चिंता जताई।

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