नई दिल्ली
कांग्रेस के नए अध्यक्ष के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे की राह आसान नहीं है। उनके सामने चुनौतियों की लंबी फेहरिस्त है। इन चुनौतियों में पार्टी पर अपना नियंत्रण कायम करना, पार्टी में अंदरूनी कलह खत्म करना, दलितों को पार्टी के साथ जोड़ना और पार्टी को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मुकाबले के लिए तैयार करना शामिल है। इन सब चुनौतियों के बीच खड़गे के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को अध्यक्ष के तौर पर स्थापित करना है, क्योंकि, पार्टी में हाईकमान कल्चर है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि असल ताकत गांधी परिवार के हाथ में ही रहेगी। ऐसे में खड़गे किस तरह अध्यक्ष के तौर पार्टी में अपनी बात मनवा पाते हैं, यह वक्त तय करेगा।
यूं तो अध्यक्ष के तौर पर खड़गे का पहला इम्तिहान गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव होंगे, पर उनके लिए असल चुनौती 2023 से शुरू होगी। अगले साल राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक सहित दस राज्यों में चुनाव हैं। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनके सामने चुनावों में पार्टी को जीत की चुनौती है। इन चुनाव के खत्म होते ही 2024 के लोकसभा चुनाव का रण शुरू हो जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर खड़गे की यह असल परीक्षा होगी क्योंकि, इन चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ है। विपक्ष बंटा हुआ है और लोगों के बीच प्रधानमंत्री की छवि बरकरार है। ऐसे में पार्टी को जीत की दहलीज तक पहुंचाना आसान नहीं है।
कार्यकर्ताओं में जान फूंकना
एक के बाद एक विधानसभा चुनाव में हार से पार्टी नेता और कार्यकर्ता हताश हैं। कई राज्यों में कार्यकर्ताओं ने दूसरी पार्टियों में अपनी जगह तलाश ली है। ऐसे में अध्यक्ष के तौर पर खड़गे को कार्यकर्ताओं में भरोसा जगाना होगा। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह अहसास दिलाना होगा कि कांग्रेस चुनाव में भाजपा का मुकाबला कर सकती है।
पार्टी को एकजुट रखना
कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर खड़गे के सामने पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती है। पार्टी में एक तबका नाराज है। वह लगातार पार्टी के फैसलों पर सवाल उठा रहा है। पार्टी नेता कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टियों में जगह तलाश रहे हैं। ऐसे में खड़गे के लिए अध्यक्ष के तौर पर पार्टी को एकजुट रखते हुए सभी को साथ लेकर चलना होगा।
गहलोत बनाम पायलट की लड़ाई
राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वरिष्ठ नेता सचिन पायलट में घमासान जारी है। दोनों नेता एक दूसरे के खिलाफ जमकर बयानबाजी कर रहे हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद आलाकमान इसका समाधान करने में नाकाम रहा है। खड़गे को इस झगड़े को खत्म करना होगा।
संवाद प्रक्रिया को बहाल करना
पार्टी के अंदर लंबे वक्त से यह सवाल उठता रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व का स्थानीय नेताओं के साथ संवाद खत्म हो गया है। कार्यकर्ता और नेतृत्व के बीच संवादहीनता है। पार्टी छोड़ने वाले कई नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया है। इसलिए खड़गे के सामने पार्टी के अंदर संवाद की प्रक्रिया को बहाल कर नेताओं का भरोसा जीतने की चुनौती है।
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